कब किस बात से इंसान बदल जाए

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एक लड़का एक लड़की एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे 💑 लड़का का नाम आलोक था और लड़की का नाम शिवानी .. दोनों शादी भी करना चाहते थे।* *दोनों ने अपने घर में बात की दोनो के घर वाले तैयार हो गए शादी भी हो गई दोनों ही बहुत खुश थे उनके घर वाले भी बहुत खुश थे।*   *लेकिन शिवानी और उसकी सास में बिल्कुल भी नहीं बनती रोज कुछ ना कुछ झगड़ा या कोई बात हो ही जाती पहले तो इन बातों को आलोक  इग्नोर करता रहा ।*  *लेकिन आलोक बहुत परेशान होता रोज रोज झगड़ा देख कर उसे और भी परेशानियां थीं।*  *ऑफिस जाता काम में उसका मन नहीं लगता वह अपनी पत्नी और अपनी मां के बारे में ही सोचता रहता कि किसी तरह झगड़ा बंद हो लेकिन ऐसा नहीं होता रोज झगड़ा होता तभी उसने फैसला किया उसने अपनी फैमिली से अलग रहने का... उसकी पत्नी यह जानकर पहले तो बहुत खुश हुई*    .*,,,, लेकिन बाद में ....* *सोचने लगी क्या यह ठीक रहेगा हम अलग रहेंगे ...पहले अपना घर छोड़ आई और अब ससुराल भी छोड़ दूं। मैंने अपने मां-बाप छोड़े क्या इनके भी छुड़ा दूं ।  क्योंकि उसका पति भी मन ही मन अपनी फैमिली को नहीं छोड़ना चाहता था...

*!! चरित्र !!*


 एक राजपुरोहित थे। वे अनेक विधाओं के ज्ञाता होने के कारण राज्य में अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। बड़े-बड़े विद्वान उनके प्रति आदरभाव रखते थे पर उन्हें अपने ज्ञान का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका विश्वास था कि ज्ञान और चरित्र का योग ही लौकिक एवं परमार्थिक उन्नति का सच्चा पथ है। प्रजा की तो बात ही क्या स्वयं राजा भी उनका सम्मान करते थे और उनके आने पर उठकर आसन प्रदान करते थे एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई कि राजदरबार में उन्हें आदर और सम्मान उनके ज्ञान के कारण मिलता है अथवा चरित्र के कारण? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए। खजाना देखकर लौटते समय उन्होंने खजाने में से पाँच बहुमूल्य हीरे उठाए और उन्हें अपने पास रख लिया। खजांची देखता ही रह गया। राजपुरोहित के मन में धन का लोभ हो सकता है। खजांची ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।*उसका वह दिन उसी उधेड़बुन में बीत गया।*

*दूसरे दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित पुन: खजाने की ओर मुड़े तथा उन्होंने फिर पाँच हीरे उठाकर अपने पास रख लिए। अब तो खजांची के मन में राजपुरोहित के प्रति पूर्व में जो श्रद्धा थी वह क्षीण होने लगी।तीसरे दिन जब पुन: वही घटना घटी तो उसके धैर्य का बाँध टूट गया। उसका संदेह इस विश्वास में बदल गया कि राजपुरोहित की ‍नीयत निश्चित ही खराब हो गई है।*

उसने राजा को इस घटना की विस्तृत जानकारी दी। राजा को इस सूचना से बड़ा आघात पहुँचा। उनके मन में राजपुरोहित के प्रति आदरभाव की जो प्रतिमा पहले से प्रतिष्ठित थी वह चूर-चूर होकर बिखर गई।चौथे दिन जब राजपुरोहित सभा में आए तो राजा पहले की तरह न सिंहासन से उठे और न उन्होंने राजपुरोहित का अभिवादन किया, यहाँ तक कि राजा ने उनकी ओर देखा तक नहीं। राजपुरोहित तत्काल समझ गए कि अब योजना रंग ला रही है।*उन्होंने जिस उद्देश्य से हीरे उठाए थे, वह उद्देश्य अब पूरा होता नजर आने लगा था। यही सोचकर राजपुरोहित चुपचाप अपने आसन पर बैठ गए। राजसभा की कार्यवाही पूरी होने के बाद जब अन्य दरबारियों की भाँति राजपुरोहित भी उठकर अपने घर जाने लगे तो राजा ने उन्हें कुछ देर रुकने का आदेश दिया। सभी सभासदों के चले जाने के बाद राजा ने उनसे पूछा - 'सुना है आपने खजाने में कुछ गड़बड़ी की है।'*इस प्रश्न पर जब राजपुरोहित चुप रहे तो राजा का आक्रोश और बढ़ा। इस बार वे कुछ ऊँची आवाज में बोले -'क्या आपने खजाने से कुछ हीरे उठाए हैं?'* *राजपुरोहित ने हीरे उठाने की बात को स्वीकार किया। राजा का अगला प्रश्न था - 'आपने कितेने हीरे उठाए और कितनी बार?' राजा ने पुन: पूछा - 'वे हीरे कहाँ हैं?'*

राजपुरोहित ने महारानी जी की ओर देखा महारानी जी ने पुड़िया निकाली और राजा के सामने रख दी जिसमें कुल पंद्रह हीरे थे। राजा के मन में आक्रोश, दुख और आश्चर्य के भाव एक साथ उभर आए।*राजा बोले - 'राजपुरोहित जी आपने ऐसा गलत काम क्यों किया? क्या आपको अपने पद की गरिमा का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रहा। ऐसा करते समय क्या आपको लज्जा नहीं आई? आपने ऐसा करके अपने जीवनभर की प्रतिष्ठा खो दी। आप कुछ तो बोलिए,*

*आपने ऐसा क्यों किया और  फिर यह पुड़िया महारानी साहब के पास कैसे आई?*राजा की अकुलाहट और उत्सुकता देखकर राजपुरोहित ने राजा को पूरी बात विस्तार से बताई कि में राज्य खजाने से उठाई हुई वस्तु को अपने पास कैसे रख सकता था...  तथा प्रसन्नता प्रकट करते हुए राजा से कहा - 'राजन् केवल इस बात की परीक्षा लेने हेतु कि ज्ञान और चरित्र में कौन बड़ा है, मैंने आपके खजाने से हीरे उठाए थे अब मैं निर्विकल्प हो गया हूँ। यही नहीं आज चरित्र के प्रति मेरी आस्था पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ गई है।*आपसे और आपकी प्रजा से अभी तक मुझे जो प्यार और सम्मान मिला है। वह सब ज्ञान के कारण नहीं ‍अपितु चरित्र के ही कारण था। आपके खजाने में सबसे अधिक बहुमू्ल्य वस्तु सोना-चाँदी या हीरा-मोती नहीं बल्कि चरित्र है।*

*अत: मैं चाहता हूँ कि आप अपने राज्य में चरित्र संपन्न लोगों को अधिकाधिक प्रोत्साहन दें ताकि चरित्र का मूल्य दिन प्रतिदिन बढ़ता रहे।*


 *कहा जाता है -*


*धन गया,कुछ नहीं गया,*

*स्वास्थ्‍य गया,कुछ जाय!*

*चरित्र गया तो सब कुछ गया*

*ज्ञानी  गए  बतलाए*  


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